दिल्ली की हवा और हमारा भ्रम

दिल्ली की हवा और हमारा भ्रम

वायु प्रदूषण पर हमारी वैज्ञानिक समझ जितनी गहरी होती जा रही है, उससे निपटने की हमारी क्षमता उतनी ही घटती दिखती है। पर्यावरण पत्रकार सोपान जोशी ने एक बार लिखा थे कि विज्ञान और आंकड़ों की भाषा कई बार उस कठिन चीज़ को नहीं समझा पाती जिसे साहित्य सहजता से समझा देता है। वह मीर तकी मीर का हवाला देते हैं, जिन्होंने कहा था, “देख तो दिल के जाँ से उठता है, ये धुआँ-सा कहाँ से उठता है।” दो सौ साल पहले यह सवाल शायद घर के चूल्हे या घाट पर जलते उपलों के धुएँ को देखकर उठता था, लेकिन दिल्ली आज भी वही प्रश्न दोहरा रही है बस धुआँ बदल गया है, उसके स्रोत बदल गए हैं, और उसकी मार कहीं अधिक भीषण हो चुकी है।

कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार दिल्ली की जहरीली हवा लोगों की औसत आयु में लगभग दस साल की कटौती कर देती है। बच्चों की स्थिति और भी चिंताजनक है; अनेक अध्ययनों में पाया गया है कि हर तीसरा बच्चा सामान्य बच्चों की तुलना में फेफड़ों के दृष्टि से कमजोर पाया गया है। इतने दशकों से हम इसे समझते आ रहे हैं, आँकड़े जमा कर रहे हैं और चेतावनियाँ सुन रहे हैं। फिर भी हवा साफ़ क्यों नहीं हो पाती?

हकीकत यह है कि वायु प्रदूषण का यह संकट केवल उद्योग या ट्रैफिक का परिणाम नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के विशेष भूगोल, यहाँ की नदियाँ, यहाँ की सघन आबादी और हमारे विकास के मॉडल की संयुक्त देन है। जो धुआँ आज मापने वाली मशीनों में पकड़ में आता है, उसका इतिहास सैकड़ों साल पुराना है और उसका कारणात्मक भूगोल लाखों साल पुराना है।

उत्तर भारत का विशाल गंगा यमुना मैदानी इलाका वह धरातल है जो प्राचीन टेक्टानिक प्लेट के टकराव से उठा और हिमालय की नदियों ने इसे गाद और मिट्टी से भरकर समतल मैदान में बदल दिया। यह मैदान असल में एक विशाल घाटी है। उत्तर में हिमालय की ऊँची दीवार, दक्षिण में विंध्य व मालवा के पठार और पश्चिम में थार का रेगिस्तान। इन सब के बीच उत्तर भारत एक प्राकृतिक कटोरे जैसा है जहाँ हवा का प्रवाह देश के अन्य हिस्सों की तुलना में धीमा रहता है। सर्दियों में हिमालय से उतरती बर्फीली हवाएँ ऊपरी वायुमंडल में एक ठंडी परत बना देती हैं, जिसके नीचे प्रदूषक ऊपर उठ नहीं पाते। यही कारण है कि दिल्ली, कानपुर, वाराणसी और पटना जैसे नगर एक तरह के ‘प्रेशर कुकर’ में बसे हुए हैं, जहाँ धुआँ और गैसें फँस जाती हैं। जो धुआँ दक्षिण भारत के किसी शहर में आधे घंटे में छिटक जाता, वह दिल्ली में कई दिनों तक मंडराता रहता है।

पुराने समय का धुआँ घरों में जलती लकड़ी या कंडों का था; आज दिल्ली और NCR की हवा में उपस्थित धुआँ कहीं अधिक मारक है। PM2.5, NO₂, CO और अनेक विषैली गैसें मिलकर एक जानलेवा मिश्रण बनाती हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की हालिया रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि शुरुआती सर्दियों में PM2.5 का स्तर NO₂ और CO के साथ लगभग एक ही ताल में बढ़ता-घटता रहा, जो स्पष्ट रूप से वाहनों और स्थानीय दहन-स्रोतों के योगदान को रेखांकित करता है। यह एक ऐसा “टॉक्सिक कॉकटेल” है जो धीरे-धीरे फेफड़ों में समाता जाता है।

CSE ने यह भी रेखांकित किया है कि कई मॉनिटरिंग-स्टेशन्स पर CO के स्तर में लंबे समय तक उल्लंघन दर्ज हुआ। यह संकेत है कि दिल्ली की हवा केवल “गंदी” नहीं है, बल्कि रासायनिक दृष्टि से भी विषैला बन चुकी है। इस वर्ष पंजाब व हरियाणा में पराली जलने की घटनाएँ कम रहीं; SAFAR के आंकड़ों के मुताबिक अधिकांश दिनों में पराली का योगदान 5% से भी कम रहा, पर AQI फिर भी नवंबर के लगभग पूरे महीने ‘बेहद खराब’ से ‘गंभीर’ श्रेणी में बना रहा। इसका मतलब यह है कि पराली कम होने के बावजूद स्थानीय स्रोत वाहन, रिहायशी दहन, निर्माण और औद्योगिक उत्सर्जन मुख्य दोषी बने रहे।

इस समस्या की जड़ हमारी व्यवस्था में है। राजनीति और प्रशासन अक्सर भूगोल की सीमाओं और प्रकृति की जमीनी सच्चाइयों को नजरअंदाज कर देते हैं। उत्तर भारत के इस कटोरे में उद्योग, वाहन, कचरा जलाना और पावर प्लांट मिलकर एक सीमित वायुमंडलीय स्थान को जहरीला कर देते हैं; फिर भी हमारे “उपचार” समस्या के अनुरूप नहीं होते। उदाहरण के तौर पर शहरों में बड़े खर्चे कर स्थापित किए जाने वाले ‘स्मॉग टावर’ जैसी तकनीकी अल्पकालिक व्यवस्थाएँ समस्या की जड़ को छूने की बजाय केवल रूपक के तौर पर दिखाई देती हैं। इन उपायों को देखकर ऐसा लगता है कि सभ्यता के टंकी में कबूतर मरा हुआ है और हम टोंटी साफ कर रहे हैं।

CSE की रिपोर्ट यह भी इंगित करती है कि जिन वर्षों में कुछ सुधार दिखाई दिया था, वे रुझान अब ठहर गए हैं और दिल्ली की वार्षिक PM2.5 प्रवृत्ति फिर से उच्च स्तर पर स्थिर हो गई है; अगर बुनियादी, संरचनात्मक बदलाव नहीं किए गए तो यह स्थिरता उलट सकती है और प्रदूषण का स्तर और बढ़ सकता है।

हमारे विकास का जिस प्रकार का मॉडल अब प्रचलित है कोयला, पेट्रोलियम, कंक्रीट और भारी औद्योगीकरण की लकीर, वह पर्यावरण को बलि चढ़ा कर आकार ले रहा है। दुनिया में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलेंगे जहाँ पर्यावरण का विनाश कर समृद्धि हासिल करके फिर उसी समृद्धि से पर्यावरण को पुनर्जीवित किया गया हो। समाज की सेहत, अर्थव्यवस्था की स्थिरता और जीवन की गुणवत्ता तीनों का आधार प्रकृति के साथ संतुलन पर टिका होता है; इसे नष्ट कर हम अपने भविष्य की पूँजी जला रहे हैं।

मीर ने पूछा था, ये धुआँ-सा कहाँ से उठता है?” आज हम इस प्रश्न का उत्तर यथास्पष्ट दे सकते हैं: यह धुआँ वहीं से उठता है जहाँ विज्ञान की चेतावनियों को राजनीति और तात्कालिक इच्छाओं की सुविधाजनक व्याख्याएँ दबा देती हैं; जहाँ विकास को प्रकृति के विरुद्ध घुमाया जाता है; जहाँ भूगोल, जनसंख्या, जल, हवा और धरती की सीमाओं को समझने की बजाय उन्हें अनदेखा किया जाता है। दिल्ली की हवा किसी एक तकनीकी जुगाड़ से साफ़ नहीं होगी। यह तभी साफ़ होगी जब हमारी विकास की परिभाषा बदलेगी, जब नीति-निर्माता भूगोल और विज्ञान को गंभीरता से समझेंगे, और जब समाज यह तय करेगा कि स्वस्थ जीवन ही वास्तविक समृद्धि है।

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