साइकिल ने बहुत लंबा सफर तय किया है। एक समय था जब साइकिल को एक खास चीज़ माना जाता था और एक समय था जब दिल्ली की सड़कों पर साइकिल आम दिखाई देती थी। उसकी घंटी की ट्रिंग-ट्रिंग की आवाज़ शहर में सुनाई देती थी। आज दिल्ली की सड़कों पर मोटर गाड़ियों और दोपहिया वाहनों की संख्या बहुत बढ़ गई है। ऐसे में साइकिल चलाने वालों के लिए उन सड़कों पर चलना मुश्किल हो गया है, जो मुख्य रूप से कारों और दोपहिया वाहनों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। फिर भी, आज भी पैदल चलना और साइकिल चलाना दिल्ली में आने-जाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के अनुसार, दिल्ली में हर दिन करीब 11.7 लाख लोग पैदल चलकर काम पर जाते हैं, जबकि करीब 4.6 लाख लोग साइकिल से काम पर जाते हैं। इस तरह कुल मिलाकर करीब 16.3 लाख लोग पैदल या साइकिल से काम पर जाते हैं। इसके मुकाबले, करीब 13.3 लाख लोग अपने निजी मोटर वाहनों से काम पर जाते हैं। इनमें लगभग 7.5 लाख लोग दोपहिया वाहनों से और 5.8 लाख लोग कार, जीप या वैन से सफर करते हैं।
दूसरे शब्दों में, निजी मोटर वाहनों से जाने वालों की तुलना में ज्यादा लोग पैदल या साइकिल से काम पर जाते हैं। फिर भी, दिल्ली की सड़कों पर पैदल चलने वालों और साइकिल चलाने वालों के लिए बहुत कम जगह और सुरक्षा है।

हमने ऐसे ही कुछ लोगों से बात की, जो आज भी अपनी साइकिल की ट्रिंग-ट्रिंग के सहारे रोज़ सफर करते हैं। हमने यह समझने की कोशिश की कि वे दिल्ली में बढ़ती गर्मी और सड़कों पर बढ़ती भीड़ के बीच कैसे सफर कर रहे हैं।
उन लोगों में से एक थे रामेश्वर, जो पिछले 30 सालों से साइकिल से काम पर जाते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले पाँच सालों में गर्मी बढ़ने का असर खास तौर पर महसूस हुआ है।
साइकिल चलाने वालों के लिए गर्मी में यह बदलाव सिर्फ मौसम की खबरों तक सीमित नहीं है। वे इसे ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े रहते हुए, बसों और कारों के साथ साइकिल चलाते हुए और उन सड़कों पर सफर करते हुए खुद महसूस करते हैं, जो दिनभर की गर्मी सोखकर बहुत गर्म हो जाती हैं।
जब 37°C भी 53°C जैसा लगे
दिल्ली में बढ़ती गर्मी साइकिल चलाने वालों के लिए और भी बड़ी परेशानी बन रही है, क्योंकि सफर के दौरान वे सीधे गर्मी और धूप के संपर्क में रहते हैं।
2020 से 2025 के बीच, दिल्ली में हीट इंडेक्स 46°C से 50°C तक दर्ज किया गया। हीट इंडेक्स यह बताता है कि तापमान इंसान के शरीर को असल में कितना गर्म महसूस होता है। 30 जून 2026 को दिल्ली का हीट इंडेक्स 53°C तक पहुंच गया, जबकि हवा का असली तापमान करीब 37°C था। बाहर कई घंटे रहने वाले लोगों, खासकर साइकिल चलाने वालों के लिए यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
थर्मामीटर पर तापमान भले ही 37°C दिखे, लेकिन धूप में ट्रैफिक के बीच साइकिल चलाने वाले व्यक्ति को गर्मी इससे कहीं ज्यादा महसूस हो सकती है।
हवा का असली तापमान 40°C से भी कम था, इसलिए यह मैदानी इलाकों में हीट वेव घोषित करने के लिए भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की तय सीमा तक नहीं पहुंचा था।
दिल्ली में 2011 से 2026 के बीच हीट वेव वाले दिनों की संख्या में काफी बदलाव आया है। सबसे ज्यादा हीट वेव वाले दिन 2022 में 17 रहे, और 2024 में 14 दिन रहे। हालांकि हर साल लगातार बढ़ोतरी नहीं हुई है, लेकिन हाल के वर्षों में बहुत ज्यादा गर्मी पड़ने की घटनाएं ज्यादा गंभीर हुई हैं। लेकिन साइकिल चलाने वालों के लिए कुछ घंटों की तेज गर्मी भी रोज़ के सफर को मुश्किल बना सकती है।
जब हमने साइकिल चलाने वालों से गर्मियों में साइकिल चलाते समय आने वाली परेशानियों के बारे में पूछा, तो सभी का एक ही जवाब था, बहुत ज्यादा थकान, खासकर दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे के बीच। सुनील सिंह ने यह भी बताया कि इस समय के दौरान उन्हें लो ब्लड प्रेशर की समस्या महसूस होती है।
ट्रैफिक सिग्नल पर बढ़ती गर्मी
साइकिल चलाने वालों के लिए दिल्ली का ट्रैफिक जाम गर्मी का एक और ऐसा कारण है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। जब साइकिल चलती रहती है, तो हवा चलने से कुछ राहत मिलती है। लेकिन जब ट्रैफिक रुक जाता है, तो साइकिल चलाने वाले कई मिनट तक कारों, बसों और दोपहिया वाहनों के बीच फंसे रहते हैं।
कारों और खासकर बसों के ए.सी से निकलने वाली गर्म हवा आसपास खड़े साइकिल चालकों को और ज्यादा गर्मी महसूस कराती है।
हमने साइकिल चलाने वालों से पूछा कि ट्रैफिक में एसी चल रही बसों और कारों के पास खड़े या साइकिल चलाते समय उन्हें कितनी गर्मी और परेशानी महसूस होती है। इसके लिए 1 से 10 तक की रेटिंग दी गई थी, जहां 1 का मतलब बहुत कम या कोई परेशानी नहीं और 10 का मतलब बहुत ज्यादा गर्मी और परेशानी था।
लगभग हर साइकिल चालक ने इसे 10 में से 10 की रेटिंग दी। रविंदर सिंह ने इसे 9 की रेटिंग दी। रेटिंग में थोड़ा अंतर होने के बावजूद, सभी एक बात पर सहमत थे कि ट्रैफिक में बस के पास खड़ा होना उनके सफर के सबसे ज्यादा परेशान करने वाले हिस्सों में से एक है।
इसका मतलब है कि साइकिल चलाने वालों के लिए ट्रैफिक जाम सिर्फ समय की देरी नहीं है। यह उस समय, लंबे समय तक गर्मी में रहने का कारण भी बनता है, जब उनका शरीर पहले से ही साइकिल चलाने की वजह से थका हुआ होता है।
जब सड़क खुद गर्मी का स्रोत बन जाती है
साइकिल चलाने वालों को सिर्फ हवा की गर्मी नहीं झेलनी पड़ती। उनके नीचे की सड़क भी बहुत ज्यादा गर्म हो सकती है।
19 मई को दिल्ली के अलग-अलग मौसम केंद्रों पर अधिकतम हवा का तापमान 46.5°C, 45.1°C और 45.5°C दर्ज किया गया। लेकिन शहर के कुछ हिस्सों में जमीन की सतह का तापमान करीब 60°C तक पहुंच गया। यानी सड़क की सतह का तापमान हवा के तापमान से लगभग 15°C ज्यादा था।
गर्मी सूरज डूबने के बाद भी बनी रही। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, दिल्ली में 14 सालों की सबसे गर्म रात दर्ज की गई। रात का न्यूनतम तापमान 32.4°C रहा, जो सामान्य से 5.7°C ज्यादा था। इसका मतलब था कि दिनभर बाहर रहने वाले लोगों को रात में भी ज्यादा राहत नहीं मिली। साइकिल चलाने वालों के लिए गर्म हवा और दिनभर गर्म हुई सड़कों का यह मेल रोज़ के सफर को और भी मुश्किल बना देता है।
क्या गर्मी का असर साइकिल पर भी पड़ रहा है?
बहुत ज्यादा गर्मी का असर साइकिलों पर भी पड़ सकता है। जब हमने साइकिल चलाने वालों से पूछा कि क्या गर्मियों में उनकी साइकिल और उसके हिस्से पहले की तुलना में जल्दी खराब या घिसने लगे हैं, तो आधे साइकिल चालकों ने कहा कि उन्होंने अपने टायरों को पहले से जल्दी घिसते हुए देखा है।
रविंदर सिंह ने बताया कि अब उनकी साइकिल के टायर सिर्फ एक से दो साल चलते हैं, जबकि पहले वे पांच से छह साल तक चल जाते थे। ये बातें साइकिल चलाने वालों के अपने अनुभव हैं, किसी वैज्ञानिक अध्ययन के नतीजे नहीं। फिर भी, ये लंबे समय तक गर्म सड़कों के संपर्क में रहने से होने वाले एक और संभावित असर की ओर इशारा करते हैं।
डामर की सड़कें सूरज की बहुत सारी गर्मी सोखकर उसे अपने अंदर बनाए रखती हैं। इसलिए सड़क की सतह आसपास की हवा से काफी ज्यादा गर्म हो सकती है। ऐसी गर्म सतह पर लगातार साइकिल चलाने से टायर और साइकिल के दूसरे हिस्से जल्दी घिस सकते हैं।
गर्मी से राहत: पानी, सुबह और छोटे अनुकूलन
दिल्ली में गर्मियों की तेज गर्मी से लोगों को राहत देने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। दिल्ली सरकार शहर में 85 कूलिंग सेंटर चलाती है, जहां कूलर, पीने का पानी और दूसरी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
शहर में मौजूद पारंपरिक प्याऊ भी राहगीरों को मुफ्त पीने का पानी उपलब्ध कराते हैं।
साइकिल चलाने वालों के लिए ये सुविधाएं काफी मददगार हो सकती हैं। रामेश्वर ने बताया कि वह अपने सफर के दौरान अक्सर प्याऊ का इस्तेमाल करते हैं। उनके अनुसार, जिन प्याऊ का वह इस्तेमाल करते हैं, वे अच्छी तरह से रखे गए हैं और सही स्थिति में हैं।
लेकिन साइकिल चलाने वाले गर्मी से बचने के लिए अपनी दिनचर्या में भी बदलाव कर रहे हैं। जब हमने उनसे पूछा कि वे गर्मी से कैसे बचते हैं, तो लगभग सभी ने एक ही सलाह दी—सफर जल्दी शुरू करें।
सुबह जल्दी निकलने से वे दोपहर की सबसे तेज गर्मी से बच जाते हैं और साथ ही भारी ट्रैफिक में कम समय बिताना पड़ता है। संजोत सिंह, निखिल सिंह और सुनील सिंह अब पहले की तुलना में करीब एक घंटा पहले काम के लिए निकलते हैं। वहीं, रविंदर सिंह अब सुबह 7:30 बजे अपना सफर शुरू करते हैं, जबकि पहले वे सुबह 10 बजे निकलते थे।
साइकिल चलाने वालों ने यह भी बताया कि पर्याप्त पानी पीना और शरीर में पानी की कमी न होने देना बहुत जरूरी है। लेकिन अपनी दिनचर्या में बदलाव करके साइकिल चलाने वाले आखिर कितनी राहत पा सकते हैं? बड़ा सवाल यह है कि क्या शहर खुद भी बदल सकता है।
सड़क पर खतरा सिर्फ गर्मी नहीं है
जब हमने साइकिल चलाने वालों से गर्मियों में आने वाले खतरों और परेशानियों के बारे में पूछा और यह जानना चाहा कि ये दूसरी ऋतुओं से कैसे अलग हैं, तो लगभग सभी ने कहा कि ज्यादातर समस्याएं पूरे साल एक जैसी ही रहती हैं।
ट्रैफिक की भीड़, वाहन चालकों का लापरवाही से गाड़ी चलाना और कारों व दोपहिया वाहनों का साइकिल लेन और फुटपाथ पर आ जाना उनकी सबसे बड़ी परेशानियों में शामिल हैं। गर्मी इन पहले से मौजूद समस्याओं को और बढ़ा देती है।
अगर किसी साइकिल चालक को साइकिल लेन से बाहर निकलने पर मजबूर होना पड़े, तो उसे तेज रफ्तार वाहनों के और करीब चलना पड़ सकता है। ट्रैफिक सिग्नल पर फंसने पर उसे ज्यादा देर तक गर्मी में खड़ा रहना पड़ता है। वहीं, बिना छाया वाली सड़क पर चलने वाले साइकिल चालक को धूप से बचने का बहुत कम मौका मिलता है।
उनकी चिंताएं बेवजह नहीं हैं। दिल्ली में साइकिल चलाने वाले सड़क पर सबसे ज्यादा जोखिम वाले लोगों में शामिल हैं। रिपोर्ट किए गए साइकिल हादसों में से करीब आधे हादसों में साइकिल चलाने वाले की जान चली जाती है।

जब साइकिल लेन गायब हो जाती हैं
साइकिल चलाने वालों की यह स्थिति एक और सवाल खड़ा करती है। क्या दिल्ली में पिछले कुछ सालों में साइकिल चलाना आसान हुआ है या मुश्किल? हमने जिन साइकिल चालकों से बात की, लगभग सभी का मानना था कि हालात पहले भी खराब थे और अब भी खराब हैं।
हालांकि, रविंदर सिंह को वह समय याद है जब खानपुर–श्री फोर्ट वाले रास्ते पर अलग साइकिल लेन बनने के बाद साइकिल चलाना थोड़ा आसान हो गया था।
उन्हें यह भी याद है कि इन साइकिल लेन के किनारे पेड़ होने की वजह से यह रास्ता बाकी जगहों की तुलना में काफी ठंडा महसूस होता था।
उनकी बात तापमान से जुड़े आंकड़ों से भी सही साबित होती है। पेड़ों की छाया वाली सड़कें, सीधे धूप में आने वाली सड़कों की तुलना में 15–17°C तक ठंडी हो सकती हैं। इसका मतलब है कि पेड़ों और हरियाली वाली साइकिल लेन सिर्फ देखने में अच्छी नहीं होतीं, बल्कि साइकिल चलाने वालों को तेज गर्मी से राहत भी दे सकती हैं।
हालांकि, अब इस रास्ते की स्थिति बदल गई है। रविंदर ने बताया कि चल रहे मेट्रो निर्माण का असर साइकिल लेन पर पड़ा है, जिससे यहां साइकिल चलाना पहले से मुश्किल हो गया है।
खानपुर–श्री फोर्ट वाले रास्ते पर यह बदलाव साफ दिखाई देता है। मेट्रो निर्माण और सड़क को चौड़ा करने के काम के दौरान मुख्य सड़क और साइकिल लेन के बीच का डिवाइडर हटा दिया गया है। इससे कारों और मोटरसाइकिलों के लिए साइकिल चालकों और पैदल चलने वालों के लिए बनाई गई जगह में आना आसान हो गया है।

इसका नतीजा यह है कि साइकिल चलाने वालों के लिए सड़क पर सुरक्षित जगह और भी कम हो गई है। एक बार फिर, साइकिल की ट्रिंग-ट्रिंग की आवाज़ गाड़ियों के तेज हॉर्न में दब जाती है।
अमेरिकी शहरी विशेषज्ञ लुईस ममफोर्ड की कही बात यहां बिल्कुल सही लगती है:
“ट्रैफिक की भीड़ कम करने के लिए सड़कें बढ़ाना ऐसा ही है जैसे मोटापे से बचने के लिए कोई मोटा आदमी अपनी बेल्ट ढीली कर ले।”
सड़कों को चौड़ा करने से थोड़े समय के लिए गाड़ियों को ज्यादा जगह मिल सकती है। लेकिन अगर इसके लिए पैदल चलने वालों और साइकिल चलाने वालों की जगह कम करनी पड़े, तो इससे सुरक्षित और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था बनाने में ज्यादा मदद नहीं मिलती।
मजबूरी से अपनी पसंद तक
आज बहुत से लोग साइकिल इसलिए नहीं चलाते क्योंकि वे ऐसा करना चाहते हैं, बल्कि इसलिए चलाते हैं क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं होता। हमने जिन साइकिल चालकों से बात की, उनमें सिर्फ रविंदर सिंह ने कहा कि वह कुछ हद तक अपनी मर्जी से साइकिल चलाते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इससे वे स्वस्थ रहते हैं। यह अंतर महत्वपूर्ण है।
अगर दिल्ली चाहती है कि ज्यादा लोग साफ और स्वस्थ यातायात के साधन के रूप में साइकिल को अपनी पसंद से अपनाएं, तो सिर्फ लोगों से ज्यादा साइकिल चलाने के लिए कहना काफी नहीं होगा। साइकिल चलाना सुरक्षित, आसान और आरामदायक बनाना होगा।
इसके लिए लगातार और सुरक्षित साइकिल लेन बनानी होंगी, फुटपाथ और साइकिल लेन पर अतिक्रमण नहीं होने देना होगा और जरूरी साइकिल मार्गों के किनारे पेड़ और छाया की व्यवस्था करनी होगी।
इसके साथ ही, खासकर उन रास्तों पर जहां बड़ी संख्या में साइकिल और पैदल चलने वाले लोग आते-जाते हैं, पीने के पानी और गर्मी से राहत देने वाली जगहों की सुविधा भी होनी चाहिए।
सबसे जरूरी बात यह है कि साइकिल लेन को सड़क की बची हुई जगह नहीं, बल्कि जरूरी परिवहन व्यवस्था का हिस्सा माना जाना चाहिए।
दिल्ली के साइकिल चालक पहले से ही बढ़ती गर्मी के हिसाब से खुद को बदल रहे हैं। वे सुबह जल्दी निकल रहे हैं, पानी साथ रख रहे हैं, अपने रास्ते बदल रहे हैं और ट्रैफिक और गर्मी झेल रहे हैं, क्योंकि उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। अब शहर को भी उनके हिसाब से बदलने की जरूरत है।
जैसे-जैसे गर्मी बढ़ेगी और ट्रैफिक भी बढ़ेगा, हो सकता है कि ज्यादा लोगों को मोटर वाहनों के तेज हॉर्न की जगह साइकिल की साधारण ट्रिंग-ट्रिंग पर निर्भर रहना पड़े। लेकिन अगर दिल्ली के भविष्य में साइकिल की यह आवाज़ और ज्यादा सुनाई दी जाये, तो सिर्फ साइकिल चालकों का हिम्मत से गर्मी और ट्रैफिक झेलना काफी नहीं होगा। उन्हें शहर में सुरक्षित, छायादार और सम्मानजनक जगह भी देनी होगी।
Author: Priyanshu Sharma
Email ID: priyanshusharms26@gmail.com
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