भारत में लोग स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, बाजार, धार्मिक स्थलों और सामाजिक आयोजनों तक कैसे पहुंचते हैं, इसकी देशव्यापी तस्वीर अब पहली बार सामने आई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के पहले National Household Travel Survey 2025-26 ने देश की रोजमर्रा की mobility को आंकड़ों के जरिए समझने का एक नया आधार दिया है। सर्वे से पता चलता है कि भारतीय किस साधन से यात्रा करते हैं, उनकी यात्रा कितनी लंबी होती है और इसके लिए उन्हें कितना खर्च करना पड़ता है।
इन आंकड़ों का महत्व सिर्फ परिवहन व्यवस्था को समझने तक सीमित नहीं है। भारत में transport sector ऊर्जा खपत, वायु प्रदूषण और greenhouse gas emissions से सीधे जुड़ा हुआ है। ऐसे में लोगों की यात्रा की आदतों को समझना यह जानने के लिए भी जरूरी है कि देश की mobility कितनी sustainable है और आने वाले वर्षों में इसे कम-कार्बन दिशा में कैसे बदला जा सकता है।
सर्वे की तस्वीर दिलचस्प है। काम पर जाने वाले लोगों में 42.6 प्रतिशत दोपहिया वाहनों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि overnight household journeys में बस 55.8 प्रतिशत और रेलवे 17.7 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे प्रमुख साधन हैं। दूसरी ओर विद्यार्थियों की दैनिक आवाजाही में पैदल चलना 37 प्रतिशत और बस 29.5 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे हैं।
यानी भारत की mobility story एक साथ दो अलग तस्वीरें दिखाती है। एक तरफ पैदल चलना, साइकिल, बस और रेल जैसे अपेक्षाकृत कम-कार्बन विकल्प मौजूद हैं, तो दूसरी तरफ खासकर शहरी कामकाजी आबादी के बीच दोपहिया वाहन रोजमर्रा के commute का सबसे बड़ा साधन बन चुके हैं।
पहली बार सामने आई देश के घरेलू सफर की व्यापक तस्वीर
MoSPI के तहत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच देश का पहला अखिल भारतीय Household Travel Survey किया। इसमें 14,274 गांवों और 10,377 शहरी ब्लॉकों को शामिल किया गया। कुल 4,92,023 परिवारों और 20,34,371 लोगों से जानकारी जुटाई गई।
सर्वे में एक किलोमीटर या उससे अधिक दूरी की यात्राओं को travel के रूप में दर्ज किया गया। इसमें यात्रा का उद्देश्य, इस्तेमाल किया गया परिवहन साधन, यात्रा में लगने वाला समय और खर्च जैसे पहलुओं को देखा गया। इससे सरकार को परिवहन मार्गों की योजना, public transport की पहुंच और infrastructure investment से जुड़े फैसलों के लिए एक महत्वपूर्ण national baseline मिलती है।
पर्यावरण के नजरिए से देखें तो यह सर्वे एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने रखता है—भारत की रोजमर्रा की mobility कितनी sustainable है?
काम पर जाने में दोपहिया सबसे आगे
सर्वे का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि fixed या non-fixed workplace तक जाने वाले लोगों में 42.6 प्रतिशत का primary mode दोपहिया वाहन है। शहरी भारत में यह हिस्सेदारी 52.3 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 37.1 प्रतिशत कामगार दोपहिया से यात्रा करते हैं।
कुल मिलाकर 28.3 प्रतिशत लोग पैदल, 42.6 प्रतिशत दोपहिया, 10.7 प्रतिशत साइकिल, 6.7 प्रतिशत बस, 6.4 प्रतिशत ऑटो-रिक्शा, 3 प्रतिशत कार और 2.1 प्रतिशत ट्रेन, मेट्रो, मोनोरेल या ट्राम जैसे साधनों का इस्तेमाल करते हैं।
यह आंकड़ा भारत के transport future के लिए बेहद अहम है। NITI Aayog के अनुसार transport sector भारत के energy-related CO₂ emissions में करीब 12 प्रतिशत योगदान देता है और road transport इस क्षेत्र के emissions का 92 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखता है। सड़क परिवहन urban air pollution में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
इसलिए दोपहिया वाहनों का इतना बड़ा commuter share एक ओर भारत की सस्ती और flexible mobility की जरूरत को दिखाता है, लेकिन दूसरी ओर petrol-based mobility से cleaner mobility की ओर संक्रमण की चुनौती भी सामने रखता है।
दोपहिया पर निर्भरता का समाधान सिर्फ वाहन छोड़ना नहीं
भारत में दोपहिया वाहन लोकप्रिय होने की कई वजहें हैं। वे कार की तुलना में अपेक्षाकृत सस्ते हैं, congested roads पर आसानी से चलाए जा सकते हैं और कई जगह public transport की सीमित उपलब्धता की भरपाई करते हैं। इसलिए sustainable mobility की रणनीति केवल लोगों से private vehicles छोड़ने की अपील करके सफल नहीं हो सकती।
इसके लिए affordable और frequent public transport के साथ सुरक्षित walking और cycling infrastructure जरूरी होगा। जहां निजी वाहन आवश्यक हों, वहां electric mobility और cleaner technologies की ओर संक्रमण भी महत्वपूर्ण होगा।
यानी भारत के लिए समाधान केवल electrification नहीं, बल्कि modal shift भी है। लोगों के पास bus, metro, rail, walking और cycling जैसे भरोसेमंद विकल्प होंगे, तभी private vehicle dependence को लंबे समय में कम किया जा सकता है।
विद्यार्थियों के लिए पैदल चलना सबसे बड़ा mobility option
स्कूल और basic-course educational institutions तक पहुंचने वाले विद्यार्थियों के आंकड़े पर्यावरण के लिहाज से अपेक्षाकृत सकारात्मक तस्वीर दिखाते हैं। कुल विद्यार्थियों में 37 प्रतिशत पैदल, 29.5 प्रतिशत बस, 15.8 प्रतिशत साइकिल, 10.5 प्रतिशत ऑटो-रिक्शा और 6.7 प्रतिशत दोपहिया से यात्रा करते हैं।
इसका मतलब है कि walking और cycling पहले से ही student mobility का बड़ा हिस्सा हैं। यह urban planning के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। अगर स्कूल, कॉलेज और residential areas सुरक्षित पैदल और साइकिल नेटवर्क से जुड़े हों, तो छोटी दूरी की कई motorised trips को कम किया जा सकता है।
सर्वे के मुताबिक 87.6 प्रतिशत विद्यार्थी 30 मिनट के भीतर अपने educational institution पहुंच जाते हैं। विद्यार्थियों की औसत यात्रा अवधि करीब 23 मिनट है। इसका अर्थ है कि education-related trips का बड़ा हिस्सा ऐसी दूरी का है जिसे बेहतर pedestrian और cycling infrastructure के जरिए कम-emission mobility में बनाए रखा जा सकता है।
ज्यादातर लोग 30 मिनट में पहुंच रहे हैं, लेकिन शहरों में commute महंगा है
सर्वे के अनुसार 83.4 प्रतिशत workers अपने fixed workplace तक 30 मिनट से कम समय में पहुंचते हैं। हालांकि ग्रामीण और शहरी भारत में यात्रा की अवधि में अंतर दिखाई देता है। ग्रामीण कामगारों की औसत यात्रा अवधि 23 मिनट है, जबकि शहरी कामगारों के लिए यह करीब 27 मिनट है।
यात्रा का आर्थिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। काम पर आने-जाने का औसत मासिक खर्च प्रति worker करीब 785 रुपये है। शहरी क्षेत्रों में यह खर्च 1,044 रुपये तक पहुंचता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में औसत खर्च 612 रुपये है।
इससे साफ है कि mobility केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है। यह household economy और affordability से भी जुड़ी है। इसलिए green mobility policy ऐसी होनी चाहिए जो प्रदूषण और emissions घटाने के साथ-साथ लोगों की travel cost को भी कम करे।
बस और रेल दिखाते हैं public transport की क्षमता
Overnight household journeys में बस 55.8 प्रतिशत और inter-city railway 17.7 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे प्रमुख साधन हैं। दोनों मिलकर ऐसी यात्राओं का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा पूरा करते हैं।
यह भारत के public transport network की क्षमता का महत्वपूर्ण संकेत है। खासतौर पर लंबी दूरी की यात्राओं में bus और rail की मजबूत मौजूदगी बताती है कि भारतीय households सामूहिक परिवहन पर काफी निर्भर हैं।
पर्यावरण के लिहाज से इसका महत्व इसलिए है क्योंकि mass transit एक ही यात्रा में बड़ी संख्या में लोगों को ले जा सकता है। इससे private vehicles की तुलना में प्रति यात्री transport demand को अधिक efficiently संभालने की संभावना बनती है।
यही कारण है कि climate policy और air-quality strategy में public transport को मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जाता है।
Overnight travel में पर्यटन से ज्यादा सामाजिक और धार्मिक यात्राएं
सर्वे का एक दिलचस्प निष्कर्ष यह है कि overnight travel का सबसे बड़ा कारण tourism नहीं है। करीब 70.2 प्रतिशत overnight household trips socializing, communication और religious activities से संबंधित हैं। इसके मुकाबले culture, leisure, sports और tourism की हिस्सेदारी 7.4 प्रतिशत है।
यह भारत की travel demand की सामाजिक प्रकृति को दिखाता है। यहां लंबी दूरी की यात्रा केवल पर्यटन के लिए नहीं होती, बल्कि परिवार, रिश्तेदारी, सामाजिक संपर्क और धार्मिक गतिविधियां भी mobility की बड़ी वजह हैं।
इसलिए sustainable inter-city mobility को केवल tourist corridors तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। बस और रेल जैसे सार्वजनिक परिवहन की उपलब्धता सामाजिक mobility और environmental sustainability दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
शहरी भारत में Metro और mass transit की भूमिका
कुल workforce commute में train, monorail और tram जैसी mass transit systems की हिस्सेदारी 2.1 प्रतिशत है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में यह लगभग 5 प्रतिशत तक पहुंचती है।
कुछ राज्यों में mass transit की हिस्सेदारी इससे काफी अधिक है। महाराष्ट्र में यह 20.7 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 16.5 प्रतिशत और दिल्ली में 14.4 प्रतिशत दर्ज की गई है।
ये आंकड़े बताते हैं कि जहां high-capacity public transport उपलब्ध है, वहां लोग उसका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन केवल metro line बनाना पर्याप्त नहीं है। Last-mile connectivity, affordable fares, pedestrian infrastructure और bus integration भी उतने ही जरूरी हैं।
अगर metro station तक पहुंचना मुश्किल हो, feeder bus उपलब्ध न हो या पैदल रास्ता सुरक्षित न हो, तो mass transit का पूरा environmental benefit हासिल करना कठिन हो सकता है।
Mobility और air pollution का सीधा संबंध
भारत में transport का environmental impact केवल carbon dioxide emissions तक सीमित नहीं है। Petrol और diesel vehicles से particulate matter, nitrogen oxides और अन्य pollutants भी निकलते हैं। सड़क परिवहन इसलिए climate change के साथ-साथ urban air quality से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।
दिल्ली-NCR इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां vehicular emissions को air pollution की समस्या से जुड़े महत्वपूर्ण contributors में माना जाता है। ऐसे में रोजाना होने वाली लाखों यात्राओं का transport mode शहर की हवा पर सीधा असर डाल सकता है।
Household Travel Survey इसलिए केवल transportation statistics नहीं है। यह बताता है कि देश के शहरों और गांवों में रोजाना किस तरह की mobility demand पैदा हो रही है और उसका environmental footprint किस दिशा में जा सकता है।
42.6 प्रतिशत workforce दोपहिया पर है तो EV transition का अवसर भी बड़ा है
दोपहिया वाहनों की बड़ी हिस्सेदारी एक चुनौती जरूर है, लेकिन इसे climate solution के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। अगर बड़ी संख्या में commuters दोपहिया वाहनों पर निर्भर हैं, तो electric two-wheelers का विस्तार transport emissions को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
लेकिन केवल petrol scooter को electric scooter से बदल देना sustainable mobility का पूरा समाधान नहीं है। अगर सड़कों पर private vehicles की संख्या लगातार बढ़ती रहती है, तो congestion, road-space demand, tyre और brake wear तथा infrastructure pressure जैसी समस्याएं बनी रह सकती हैं।
इसलिए बेहतर approach वह होगी जिसमें walking, cycling, bus, metro, rail, shared mobility और EVs एक integrated mobility system का हिस्सा बनें। Electrification के साथ public transport और non-motorised transport को मजबूत करना भी जरूरी होगा।
महिलाओं की mobility भी sustainable transport planning का हिस्सा
सर्वे में workforce mobility में gender gap भी दिखाई देता है। देशभर में 61.9 प्रतिशत पुरुष workers ने एक किलोमीटर से अधिक की daily work trip की, जबकि महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 41.9 प्रतिशत था।
यह अंतर केवल transport availability से नहीं समझा जा सकता। Employment patterns, unpaid domestic work, caregiving responsibilities, safety, social norms और workplace location जैसे कई factors महिलाओं की mobility को प्रभावित कर सकते हैं।
सुरक्षित, reliable और affordable public transport महिलाओं की mobility को बढ़ाने में मदद कर सकता है और साथ ही private vehicle dependence को सीमित करने में भी भूमिका निभा सकता है। इसलिए gender-responsive transport planning को sustainable mobility का हिस्सा मानना जरूरी है।
सिर्फ कम travel time से mobility sustainable नहीं हो जाती
सर्वे में ज्यादातर लोगों का स्कूल या workplace तक पहुंचने का समय 30 मिनट से कम है। यह एक सकारात्मक संकेत हो सकता है, लेकिन environmental sustainability केवल travel time से तय नहीं होती।
यह भी देखना जरूरी है कि कितने लोग petrol और diesel vehicles का इस्तेमाल कर रहे हैं, कितनी यात्राएं बस या rail से होती हैं, कितनी दूरी पैदल या साइकिल से तय की जा सकती है और public transport की frequency तथा last-mile connectivity कैसी है।
भविष्य में mobility data को environmental indicators के साथ जोड़ना इसलिए महत्वपूर्ण होगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किसी शहर या क्षेत्र में कम travel time के साथ-साथ कम emissions वाली mobility भी उपलब्ध है या नहीं।
भारत की sustainable mobility strategy के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सर्वे?
National Household Travel Survey का सबसे बड़ा योगदान यह है कि policy makers के पास अब household-level travel behaviour को समझने के लिए एक राष्ट्रीय baseline उपलब्ध है।
इस data की मदद से public transport की planning को अधिक targeted बनाया जा सकता है। जहां bus और rail की मांग ज्यादा है, वहां routes और frequency को बेहतर किया जा सकता है। जहां short-distance trips का हिस्सा बड़ा है, वहां footpaths और cycle infrastructure को प्राथमिकता दी जा सकती है।
इसी तरह जिन क्षेत्रों में two-wheelers का commuter share अधिक है, वहां electric two-wheelers और charging infrastructure की planning की जा सकती है। High-demand corridors में mass transit को मजबूत करके congestion और private vehicle dependence को कम करने की कोशिश की जा सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब transport policy को ground-level household mobility behaviour से जोड़ा जा सकता है।
असली चुनौती ज्यादा यात्रा नहीं, बेहतर यात्रा है
भारत में आने वाले वर्षों में mobility demand बढ़ने की संभावना है। Urbanisation, employment, education, economic activity और tourism के साथ लोगों की यात्रा की जरूरत भी बढ़ेगी।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि लोग यात्रा करें या नहीं। असली सवाल यह है कि भारत लोगों को कम प्रदूषण, कम लागत और कम ऊर्जा खपत के साथ यात्रा करने के विकल्प कैसे उपलब्ध कराए।
पहला Household Travel Survey बताता है कि walking, cycling, buses और rail भारत की mobility system के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि दोपहिया वाहन, खासकर urban workforce के बीच, रोजमर्रा के commute का dominant mode बन चुके हैं।
यही वह जगह है जहां भारत की अगली mobility strategy को दिशा मिल सकती है। यह strategy केवल अधिक सड़कों और अधिक वाहनों पर आधारित होने के बजाय बेहतर public transport, सुरक्षित walking और cycling infrastructure, electric mobility, shared transport और integrated urban planning पर केंद्रित हो सकती है।
निष्कर्ष
National Household Travel Survey 2025-26 भारत की यात्रा की आदतों का पहला बड़ा राष्ट्रीय snapshot है। इसके आंकड़े transportation planners के लिए जितने महत्वपूर्ण हैं, उतने ही environmental policy makers के लिए भी।
काम पर जाने वाले 42.6 प्रतिशत लोगों का दोपहिया से commute करना private mobility की वास्तविकता दिखाता है। दूसरी ओर overnight journeys में बस की 55.8 प्रतिशत और railway की 17.7 प्रतिशत हिस्सेदारी यह बताती है कि public transport की भूमिका अभी भी मजबूत है। विद्यार्थियों में walking और cycling की बड़ी हिस्सेदारी यह संकेत देती है कि छोटी दूरी की trips को low-carbon mobility में बनाए रखने की पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है।
अब चुनौती इस data को policy में बदलने की है। अगर भारत अपने bus और rail network को मजबूत करता है, walking और cycling को सुरक्षित बनाता है और private mobility को cleaner technologies की ओर ले जाता है, तो बढ़ती transport demand को air pollution और greenhouse gas emissions की बढ़ती समस्या में बदलने से रोका जा सकता है।
इस पूरे सर्वे का environmental message यही है कि भारत को सिर्फ ज्यादा mobility नहीं, बल्कि cleaner, affordable और inclusive mobility की जरूरत है। आने वाले वर्षों में देश की transport सफलता इस बात से तय नहीं होगी कि लोग कितनी तेजी से और कितनी दूर यात्रा कर सकते हैं, बल्कि इससे तय होगी कि वे कितनी कम लागत और कम environmental impact के साथ अपनी मंजिल तक पहुंच सकते हैं।
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